Rahat Indori, Friend Aziz Irfan Demise Of Famous Urdu Poet Rahat, Says voice of Indore has calmed down today | मां की सिफारिश से मिला था पहला मुशायरा, फिर चला ऐसा जादू कि आधी सदी तक मंचों पर उनका जलवा रहा

Rahat Indori, Friend Aziz Irfan Demise Of Famous Urdu Poet Rahat, Says voice of Indore has calmed down today | मां की सिफारिश से मिला था पहला मुशायरा, फिर चला ऐसा जादू कि आधी सदी तक मंचों पर उनका जलवा रहा


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इंदौर20 मिनट पहलेलेखक: राजीव कुमार तिवारी

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राहत इंदौरी को पहला मुशायरा देवास में मिला था, उनके मामा आयोजन कमेटी में थे।

  • मध्य प्रदेश के इंदौर में 1 जनवरी 1950 को राहत इंदौरी का जन्म हुआ था
  • मंगलवार को ही उन्होंने अपने कोरोना पॉजिटिव होने की जानकारी ट्वीट की थी

मशहूर शायर राहत इंदौरी का मंगलवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया है। सुबह उन्होंने ट्वीट कर कोरोना पॉजिटिव आने की जानकारी दी थी। उनके पॉजिटिव आने के बाद देशभर में उनके चाहने वालों ने उनके स्वस्थ होने की दुआएं की, लेकिन वे शाम 5 बजे हमारे बीच से चले गए। आधी सदी तक मंचों पर राज करने वाले राहत इंदौरी को पहले मुशायरे में शेर पढ़ने का मौका उनकी मां की सिफारिश से मिला था।

राहत इंदौरी अपने बेबाक अंदाज और बेहतरीन शायरी के लिए जाने जाते रहे हैं। अब रात साहब की केवल यादें ही हमारे बीच हैं। राहत साहब की पहली किताब धूप…थी, इसके एक शेर ने उन्हें राहत से राहत इंदौरी बना किया। वह शेर था … हमारे सिर की फटी टोपियों पर तंज ना कर, हमारे ताज अजायब घरों में रखे हैं… वे जब इसे पढ़ते थे तो लोग दीवाने हो जाया करते थे। लेकिन, यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने बचपन से ही बहुत मेहनत की। मजदूरी की, ट्रकों के पीछे पेंटिंग की।

अजीज इरफान ने उन्हें याद करते हुए बताया कि राहत साहब का परिवार बड़ा था। पिता की इतनी कमाई नहीं थी कि घर का खर्च अच्छी तरह से चल सके। इंदौर में राहत साहब नयापुरा स्थित सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे। पढ़ाई के साथ ही वे मजदूरी कर रुपए कमाने लगे थे। उन्हें रुपए कमाने का बहुत जुनून था। यहां से वे पाटनीपुरा में रहने चले गए, जहां वे पेंटिंग बनाने लगे। उन्होंने रुपयों के लिए ट्रकों के पीछे तक पेंटिंग की।

यहां से शुरू हुआ शायरी का शौक
70 के दशक में स्कूल पास करने के बाद हम राहत साहब कॉलेज पहुंचे, तब उन्हें शायरी का शौक लगा। वे शायरी तो नहीं करते थे, लेकिन शौक ऐसा था कि उन्होंने नए-पुराने शायरों की एक हजार से ज्यादा शायरी याद कर ली थी। कॉलेज में छोटी-मोटी शायरी करते थे। एक बार हमारे कॉलेज में गीतकार जावेद अख्तर के पिता प्रसिद्ध शायर जान निसार अख्तर आए हुए थे। वे ज्यादातर सिर नीचे ही झुकाकर रखते थे और ऐसे ही बात करते थे। राहत साहब को पता नहीं क्या हुआ वे अचानक उनके सामने पहुंचे और कहा कि सर मुझे शायरी करनी है। यह बात सुनकर उन्होंने सिर उठाकर राहत से कहा कि शायरी करनी है तो पहले एक हजार शायरी मुंह जुबानी याद होनी चाहिए। इस पर उन्होंने कहा – याद है, इस पर उन्होंने कहा तो फिर शुरू कर दो।

राहत साहब के दोस्त अजीज इरफान ने कहा की जो कहते थे दिल से कहते थे।

पहली शायरी में मंच देने के लिए मां से करवाई थी सिफारिश
इरफान राहत साहब की पहले मुशायरे को याद करते हुए बताते हैं कि राहत ने बताया था कि उन्होंने पहली बार देवास में शेर पढ़े थे। उस दौर में वे इंदौर में छोटे-मोटे मंच पर शायरी किया करते थे। देवास में पहली बार बड़े मंच पर वे शायरी करने पहुंचे थे। मंच तक पहुंचने का किस्सा भी काफी दिलचस्प है। मुशायरे की जानकारी लगने पर राहत साहब अपनी अम्मी के पास पहुंचे, क्योंकि उनके मामा मुशायरा कमेटी के सदस्य थे। उन्होंने मां से कहा कि वे मामा से कहें कि उन्हें मंच में शायरी पढ़ने दें। मां के कहने पर उन्हें मंच मिला और वे शेर पढ़ने देवास जा पहुंचे।

भाई और उसके दोस्त से कहा था मैं शेर पढूं तो कहना वाह… वाह.. जमकर हुई थी हूटिंग
इरफान ने बताया कि जब मंच मिला तो, क्योंकि राहत साहब पहली बार इतने बड़े मंच पर शेर पढ़ने वाले थे तो उन्होंने इसके लिए प्लानिंग की। उन्होंने अपने भाई आदिल और उसके दोस्तों को कहा कि वे भी उनके साथ देवास चलें। वहां पर वे श्रोताओं में सबसे आगे बैठें और जब वे शेर पढ़ें तो वाह… वाह… करें। शेर खत्म होने के बाद वन्स मोर.. भी कहना है। मंच पर जब राहत साहब ने शायरी की तो वह बहुत फ्लॉप रही। क्योंकि बड़े मंच पर बोलने के दौरान उनके पैर कांप रहे थे, सही तरीके से वे शेर नहीं पढ़ पा रहे थे। बावजूद प्लानिंग के तहत शेर खत्म होने पर उनके भाई और दोस्तों ने वाह.. वाह.. करते हुए वन्स मोर कहा। इस पर वहां बैठे श्रोताओं ने जमकर हूटिंग की और वहां से इन्हें लौटना पड़ा।

तरन्नुम के साथ शुरू की थी शायरी
इरफान ने बताया कि राहत साहब ने शेरो-शायरी की शुरुआत तरन्नुम पढ़ते हुए की थी, लेकिन गले में ज्यादा जोर देने से उन्हें दिक्कत होने लगी थी। इस पर लखनऊ के एक डॉक्टर से वे मिले। डॉक्टर ने उन्हें तरन्नुम ना पढ़ने की राय दी। इसके बाद वे तेहत पढ़ने लगे और विश्व में छा गए। देखते ही देखते वे हिंदुस्तानी स्टेज के किंग बन गए। उन्होंने बताया कि एक बार वे उनके साथ दिल्ली गए थे। यहां एयरपोर्ट से लेकर प्लेन तक में उनके चाहने वालों ने उन्हें घेर लिया। दिल्ली एयरपोर्ट पर भी यही नजारा दिखा। होटल में तो धक्का-मुक्की जैसी नौबत बन गई थी।

इंदौर की बड़ी आवाज आज शांत हो गई

राहत साहब के दोस्त अजीज इरफान ने बताया कि वे इंदौर की बड़ी आवाज आज शांत हो गई। वे ऐसी शख्सियत थे कि किसी भी बात को बोलने के पहले यह नहीं देखते थे कि सामने कौन खड़ा है। कई बार लोग उनकी बुराई कर देते थे, उनके पास जब यह बात पहुंचती थी तो वे कहते थे, देखो मैंने इसकी वहां पर मदद की थी। इस पर वे कहते थे जमाने का यही दस्तूर है, नेकी कर औ दरिया में डाल… वे दोस्तों के दोस्त थे।

सत्तन गुरु ने राहत साहब के साथ कई मंच साझा किए।

मेरा नाम पहले आने पर मंच पर खड़े हो गए थे राहत
प्रसिद्ध शायर सत्यनारायण सत्तन ने राहत इंदौरी को उर्दू शायरों में गालिब की तरह बताते हुए कहा कि उन्होंने इंदौर के नाम को रोशन किया। उनके जन्मदिन पर मैंने जश्ने राहत में कहा था… हर दौर में इं – दौर है इंदौर का राहत, चारों तरफ एक सोर है इंदौर का राहत। सत्तन ने दमन में मुशायरे का एक वाक्या सुनाते हुए कहा कि हम दोनों मंच पर बैठे हुए थे। कवि सम्मेलन को संचालित कर रहे संचालक ने राहत को अंतरराष्ट्रीय शायर कहते हुए उनसे पहले मेरा नाम शेर पढ़ने के लिए पुकारा। वे मुझे अपना बड़ा भाई मानते थे। यह सुन वे तत्काल मंच पर खड़े हो गए और नाराज होते हुए कहा – दादा मेरे बाद ही पढ़ेंगे। आपने गलत नाम ले लिया। दादा का मुकाम मंच यही है, वे मेरे बाद ही पढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि वे इस प्रकार से अपने बड़ों को आदर देते थे।

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